:: इज़ाफ़त ::
उर्दू, अरबी व फ़ारसी में किन्ही दो शब्दों को ‘ज़ेर’ यानी ‘ए’ के जरिये जोड़ा जा सकता है प्रक्रिया व तरकीब को ‘इज़ाफ़त’ कहते है, जैसे : सूरत-ए-यार, दिल-ए-नादाँ, गुल-ए-तर, मुग़ल-ए-आज़म आदि |
इस प्रक्रिया व तरकीब को अमूमन ‘की’ ‘के’ ‘का’ व ‘में’ आदि के इस्तेमाल से बचने के लिए किया जाता है जैसे :
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ज़ेर-ए-आस्तीन
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: आस्तीन के नीचे
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तबादला-ए-ख़याल
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: ख्यालों का तबादला, विचारों का आदान-प्रदान, बातचीत
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नक़ाब-ए-रुख़
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: चेहरे का नक़ाब
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मौसम-ए-गुल
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: गुल का मौसम, फूलों की ऋतु
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शरीक-ए-हयात
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: हयात में शरीक (‘पत्नी’ के लिए प्रयोग की जाती है ये ‘इज़ाफ़त’)
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सूरत-ए-यार
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: यार की सूरत
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परन्तु यदि “इज़ाफ़त” में जोड़े जाने वाले दो शब्दों में पहला ‘संज्ञा’ (Noun, इस्म) हैं और दूसरा ‘विशेषण’ (Adjective, तख़सीस, ख़ुसूसियत) है तब ‘विशेषण’ वाले शब्द को ‘संज्ञा’ वाले शब्द के पहले रख देते से मतलब निकल आता है जैसे :
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दिल-ए-नादाँ
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: नादान दिल
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गुल-ए-तर
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: तर गुल
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मुग़ल-ए-आज़म
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: आज़म मुग़ल, महान मुग़ल (बादशाह अकबर को दी गई एक उपाधि)
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यदि ‘इज़ाफ़त’ में पहला शब्द आकारांत होता है जैसे ‘वादा’ तो उसमे ‘आ’ की मात्रा हटा कर उसके आगे ‘ए’ जोड़ देते है, जैसे :
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‘वाद-ए-करम’
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: करम का वादा
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इसी तरह अगर पहले शब्द के आख़िर में दीर्ध ‘ई’ की मात्रा हो तो उसे हटाकर छोटी ‘ई’ की मात्रा लगा कर आगे ‘ए’ जोड़ देते है जैसे :
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‘बेचारगि-ए-इश्क़’
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: इश्क़ की बेचारगी
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‘मस्ति-ए-शबाब’
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: शबाब की मस्ती
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अमूमन ‘इज़ाफ़त’ में दूसरे शब्द के बाद ‘का’, ‘की’ या ‘के’ लगा कर पहले वाला शब्द लिखने से सही मतलब निकलता है, परन्तु यहाँ भी कुछ अपवाद है जैसे :
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‘गर्दिश-ए-दौरां’
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: गर्दिश का दौर || विपत्ति का समय
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नोट : यहाँ ‘दौर की गर्दिश’ मतलब निकालना सही नहीं होगा |
:: अत्फ़ ::
जब दो शब्दों को और से जोड़ना होता है तो उसके लिए जो तरकीब इस्तेमाल की जाती है उसे ‘अत्फ़’ कहते है जैसे :
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गुल-ओ-बुलबुल
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: गुल और बुलबुल
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शाम-ओ-सहर
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: शाम और सहर
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शब-ओ-रोज़
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: शब् और रोज़
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रात-ओ-दिन
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: रात और दिन
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यहाँ पर भी अगर पहला शब्द आकारांत होता है जैसे ‘गुंचा’ तो उसमे ‘आ’ की मात्रा हटा कर उसके आगे ‘ओ’ जोड़ देते है, जैसे :
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गुंच-ओ-गुल
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: गुंचा और गुल
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इसी तरह अगर पहले शब्द के आख़िर में दीर्ध ‘ई’ की मात्रा हो तो उसे हटाकर छोटी ‘ई’ की मात्रा लगा कर आगे ‘ओ’ जोड़ देते है जैसे :
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सादगि-ओ-शोख़ी
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: सादगी और शोख़ी
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:: अत्फ़-ओ-इज़ाफ़त
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कई शब्दों को एक साथ ‘अत्फ़ और ‘इज़ाफ़त’ दोनों के जरिये भी जोड़ा जाता है, जैसे :
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क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म
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: हयात की क़ैद और ग़म का बंद
यानी जीवन की क़ैद और दुःख का बंधन
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महाश्य और जानकारी मिल सकता है
ReplyDeleteधन्यवाद
ReplyDeleteकृपया बताएं उर्दू की और जानकारी कैसे मिलेगी?
ReplyDeleteशुक्रिया तअल्लुक़ बनाए रक्खें 👍
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